जरूरतमंद की दुआ
जरूरतमंद की दुआ
बेटी को विदा करते हुए रेखा के मम्मी पापा ने रेखा और उसकी सास, ननद के लिए भी अपनी हैसियत के हिसाब से अच्छी साडियां दीं थी, पर साडियों को देखते ही सास ननद ने बोलना शुरू कर दिया, इससे अच्छा तो सौ पचास रुपये ही दे देते और पैसे मिलाकर ढंग की साडी अपनी पसन्द की खरीद लेते , ऐसा कूडा भेजने की क्या जरूरत थी, हम नहीं पहनते ऐसी गंवारूं साडियां । रेखा का मन बुझ गया, ससुराल में आंसू बहाने की जगह आंसू पीने पडते हैं, कुछ न बोल सकी रेखा । ननद की आवाज़ ने रेखा को झकझोर दिया, ननद बोले जा रही थी, मां मन्दिरों के आगे बडे भिखारी बैठे रहते हैं, उनको दे देना यह कपडे लत्ते, बेचारों का तन ढकेगा, तो दिल से दुआ देंगें । रेखा की सहेली मीता ने एक बार सहेलियों के बीच बैठे बैठे कहा था, अगर कोई उल्टा सीधा बोल रहा हो, और आप चुपचाप सुन रहे हो तो, मतलब आप भी गलती कर रहे हो, चुप रहकर दबने और बुरा बनने से अच्छा है कि गलत को गलत कहकर बुरे बनो । रेखा के दिमाग में मीता की आवाज़ गूंजने लगी, तभी रेखा बोल पड़ी, सही बात है दीदी जिसको जरूरत है उसको ही देना चाहिए, यह साडियां गरीबों को दे दूंगीं , उनके मुंह से मेरे मम्मी पापा के लिए दिल से दुआ निकेलेगी । हैरान होकर सास ननद रेखा का मुँह देख रहीं थीं ॥
जया शर्मा प्रियंवदा
Mohammed urooj khan
24-Apr-2024 11:21 PM
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